गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

सूत्र वाक्य

अरुन्तुदं परुषं रूक्षवाचं, वाक्कण्टकैर्विदन्तं मनुष्यान्।

विद्यादलक्ष्मीकतमं जनानां, मुखे निबद्धां निर्ऋतिं वै वहन्तम्।।

अर्थातः- जो व्यक्ति अपने बुरे स्वभाव और दूसरों से हमेशा कटु और रुखी बातें कर उनके मन को दु:ख देता है। वह वाणी और व्यवहार से दरिद्र होने से हमेशा संकटों का सामना करता है। क्योंकि मुख, शब्द और वाणी की ऐसी दरिद्रता से विवाद व कलह पैदा होते हैं। जिससे उस व्यक्ति के अनेक दुश्मन या विरोधी होते हैं, जो अवसर आने पर किसी भी तरह से प्राणों के लिए घातक साबित होते हैं। यही कारण है कि ऐसे लोगों पर मौत का साया हमेशा बना रहता है।

(इस तरह सार यही है कि अगर व्यक्ति अकाल मौत से बचना चाहे तो सबसे पहले स्वभाव और बोल के दोष से हमेशा बचे।)

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

गुण्डों ओर मवालियों के हाथ जाता देश

आज अपने देश में दो बातें हुई। एक तथाकथित विपक्षी पार्टियों द्वारा आयोजित भारत बन्द दूसरी संसद भवन में कटौती प्रस्ताव पर मतदान।
दोनों अपनी पुरानी शैली में हुई, दोनो के परिणाम आपेक्षित थे। भारत बन्द के दौरान पूरे देश के गुण्डों के हवाले कर दिया गया, और कटौती प्रस्ताव मे सरकार की जीत हुई। समाजवादी पार्टी व राजद ने मुख्य तौर पर बन्द का आयोजन किया था। पुरानी स्मृतियों को ताजा करते हुए समाजवादी पार्टी व राजद के गुण्डे जहाँ तक सम्भव हो सका आगजनी करते रहे। सरकारी बसें जलाई गयी करोड़ों की सम्पत्ति की क्षति की गयी। केन्द्र सरकार की नीतियों के विरुद्ध आयोजित इस बन्द को देखकर कहीं से भी यह नही लगा कि ये केन्द्र सरकार का विरोध कर रहें है, इन्होने तो आम जन जिनके लिए ही बन्द का आयोजन किया गया था को लाचार कर दिया कि या तो हमारे साथ चलो या फिर जलती बस की तरह जलो। उक्त गुण्डागर्दी का नेतृत्व हमारे देश की तथाकथित आम जनों के हित करने वाली पर्टियाँ ही कर रही थीं। आम जन लाचार इन्हें देख रहा था। तुर्रा यह कि, यह भारत ‘गुण्डई से’ बन्द का प्रदर्शन आम जन के हितों की रक्षा के लिये किया गया था। मँहगाई से जूझ रही देश की निरीह जनता, पेट्रोल व डीजल के बढ़े दामों का विरोध करने के लिये बन्द का आयोजन किया गया था।
मायावती को तो देश या प्रदेश का जनता से कुछ लेना देना नहीं है उन्हें तो अपनी मूर्तियों को बनवाने से फुरसत नहीं है। उनकी कमजोर नस सी बी आई के हाथ में है और सी बी आई केन्द्र सरकार के हाथ में, सो मायावती को तो केन्द्र सरकार का साथ देना ही था, एक दिन पूर्व तक तो खाली मूली सस्पेन्स का दिखावा कर रहीं थीं।
समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह के पुत्र एक जगह इस गुण्डा प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे थे, उसका एक वक्तव्य सुन कर हँसी आ गयी। उन्होने कहा कि मायावती सी बी आई से डर गयी जिसके कारण उन्होनें प्रस्ताव के विरुद्ध केन्द्र सरकार के पक्ष मे वोट दिया। ये गुण्डे तत्व इतने बेफिक्र हो गये हैं कि इन्हें लगता है कि यह जो कुछ कह रहें हैं उसे ही आम जन सत्य मानते हैं। इधर वे सड़क पर केन्द्र सरकार के विरुद्ध आगजनी कर रहे थे उधर उसकी पार्टियाँ केन्द्र सरकार का साथ देने के लिये संसद से बहिर्गमन कर रही थी, शायद इस आशा में कि उनके विरुद्ध कोई कड़ी कार्यवाही न की जाय, भई हम भी तो आपकी तरह आम जन को बेवकूफ बना रहें हैं, आखिर हम हैं तो मौसेरे भाई ही।
अपने कुल जमा चार सांसदों को लेकर लालू ने संसद मे कहा कि अगर कटौती प्रस्ताव के पक्ष में ‘भाजपा’ न होती तो वे इसका समर्थन करते। क्या दलील दी है लालू ने। ऐसे ही नेताओं ने इस देश का बन्टाधार किया है।
खैर, भारत बन्द का गुण्डा प्रदर्शन भी हो गया, संसद मे सरकार भी बच गयी। बीच मे आम जन की जो दुर्दशा हुई उसकी शर्म न तो केन्द्र सरकार को होगी और न ही इस गुण्डा गर्दी करने वाले नेताओं को होगी। अगले दिन दोनो खबरें सुर्खियों में होंगी दोनो पक्ष अपने-अपने जवाँमर्दी की चर्चा करेंगे आम जन की तरफ पहले की भाँति उदासीन रहते हुए इसे आम जनता की जीत बताएंगे।
विभिन्न जातियों एवं समुदायों में बँटा आम जन पूर्व की भाँति सिर्फ अपनी दशा पर आँसू बहाता रहेगा। शायद आम जन के साथ यह ठीक ही होगा, अपने कर्मों का फल तो मिलना ही है।

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

भारत सरकार को डर नही लगता

अभी कुछ दिन पूर्व एक समाचार पत्र में पढ़ा कि रिजर्व बैंक ने देश में अंधाधुन्ध आ रही नकली मुद्रा को लेकर आगाह किया, इस पर हमारे वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने कहा कि यह उनकी नजर में कोई बड़ा खतरा नहीं है। चूंकि उसकी नजर ही सरकार की नजर है इसलिए सरकार भी इसको लेकर भयभीत नहीं है। उन्होने बाकायदा आंकड़े प्रस्तुत कर यह सिद्ध किया कि नकली करेंसी अभी कुल मुद्रा की 0.001 प्रतिशत ही है। जब तक एक के पहले लगने वाले शून्य एक के बाद में लगने न शुरु हो तब तक कोई खतरे की बात नहीं है। उन्होने यह भी कहा कि भारत छोटा मोटा देश नहीं है। हमें घबराने की जरूरत नही है। सरकार नकली मुद्रा लाने वालों पर स्टेनलेस स्टील से भी कड़ी नजर रख रही है। समस्या यह है कि स्टेनलेस स्टील पारदर्शी नही होता इसीलिये इस तरह की नजर रखने के बावजूद कुछ दिन पूर्व डुमरिया गंज जिला- सिद्धार्थ नगर, उत्तर प्रदेश के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के करेंसी चेस्ट में करोड़ों के नकली नोट बरामद हुए थे। वित्त मंत्री जी को व उनकी सरकार को ऐसी कई बातों से भय नही लगता न लगा, जिसका वर्णन उन्होने अभी नही किया है पर भविष्य मे कर सकते हैं वे निम्नवत हैं।

  • देश में आतंक वादी खुलेआम आयें, घूमें, कहाँ बम फोड़ना है इसकी रूपरेखा बनाएं और उसे पूरा करें। इस काम में सरकार व उसकी एजेंसियों का पूरा सहयोग मिलेगा, क्योंकि इनके कार्यों से सरकार नही मरती मरते है केवल आम आदमी जिसकी यहाँ बहुतायत है, करोड़ों में से कुछ हजार कम भी होते हैं तो कोई चिन्ता की बात नही। सरकार को इससे भय नही लगता क्य़ोंकि घटना के बाद बड़ी-बड़ी बातें कर वोट लूटने की काफी गुँजाइस रहती है।
  • काश्मीर से हिन्दुओं को खदेड़ा जाय, उनकी सम्पत्ति लूटी जाय, वे बेघर होकर दिल्ली व अन्य नगरों में नरकीय जीवन व्यतीत करें, इससे भी सरकार को भय नही लगता क्योंकि हिन्दू हैं ही इसी लायक। अगर इससे सरकार भयभीत हो जायेगी तो सरकार को खतरा हो जायेगा अतऐव वह इससे भयभीत नहीं, बल्कि प्रसन्न होती है कि हिन्दू इसी तरह पीटे-कुचले जाने से उसका वोट बैंक बढ़ता है।
  • असम में उल्फा आतंकवादियों द्वारा सैकड़ो निरीहों को मारने से भी सरकार भयभीत नही होती, इससे उसे राजनीति करने के नये आयाम मिलते हैं।
  • सरकार महराष्ट्र के मनसे व शिवसेना के गुंडो से भी भयभीत नही होती, वह तो इसे शह देती है क्योंकि इसमें हिन्दू ही आपस मे कटते-मरते है। अलगाव-वाद फैलता है जो सरकार के लिए खाद का काम करती है, भला इससे भयभीत क्यों हुआ जाय।
  • सरकार बम्बई, दिल्ली, अहमदाबाद शहरों मे हुए आतंकवादी घटनाओं से भी भयभीत नही होती, क्योकि इसमें कहीं भी सरकार नही मरी। आतंकवादी तो सरकार का काम आसान ही कर रहें है, ऐसी घटनाओं से आबादी में कमी आती है और सरकार को बन्दर प्रयास करने का अवसर प्राप्त होता है।
  • मधु कोड़ा जैसे लोगों द्वारा लूटपाट कर धन विदेशों में लगाने जैसी घटनाओं से भी सरकार चिन्तित नही होती, क्योकि देश मे धन की कोई कमी नहीं है, गजनी से लेकर अंग्रेज व अब देसी अंग्रेज लूट ही रहें है, इससे कोई फर्क तो पड़ा नही, क्योकि आतंकवादी नकली नोट तो ला ही रहे हैं।
  • देश को टुकड़ों में बाँटने वालों से भी सरकार भयभीत नही होती, भारत बहुत बड़ा देश है यदि इसके बीस-पच्चीस टुकड़े हो भी जाते हैं तो क्या फर्क पड़ेगा, इससे तो सरकार के मंत्रियों की संख्या ही बढ़ेगी।

    सरकार तो डरती है केवल निम्नलिखित बातों से इसीलिये वह अपनी पूरी ताकत इन्हें नष्ट करनें में लगाती है, और काम के लिये सरकार के पास न तो समय है न ही इच्छा शक्ति।

    • राष्टीय स्वयं सेवक संघ से।
    • हिन्दू एकता से।
    • मुसलमानों से वन्देमातरम् कहने वालों से।
    • देश हित की बात कहने वालों से।
    • देश की एकता और अखन्डता की केवल बातें न कर ऐसा प्रयास करने वालों से।
    • एक देश- एक कानून की माँग करने वालों से।

शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

यह क्या हो रहा है

मुरादाबाद में कांग्रेस की नेत्री रीता बहुगुणा ने एक भाषण दिया, जिसकी भाषा वास्तव में अभद्र थी। हमारे देश के पुरुष नेता मुद्दत से ऐसी भाषा का प्रयोग करते आ रहे है। हमारे देश के इन कथित नेताओं का नैतिक स्तर बहुत पहले से ही रसातल में जा चुका है। जब ये नेता संसद के भीतर भी ऐसा कह जाते हैं कि उन अंशों को संसदीय कार्यवाही से निकालना पड़ता है, तो इनका स्तर क्या है इसकी कल्पना सहज की जा सकती है। महिला आयोग काफी समय से यह प्रयास कर रहा था कि महिलाओं को पुरुष के बराबर अधिकार मिले, अन्य अधिकार अभी भले न मिले हों पर अभद्र भाषा के प्रयोग में उन्होने यह अधिकार हाँसिल कर ही लिया। इस पर महिला आयोग शायद गर्व महसूस करें। मायावती स्वयं भी शालीन भाषा का प्रयोग बहुत कम करती है। रीता बहुगुणा ने महिला होकर भी एक महिला के बारे में ऐसी अभद्र भाषा का प्रयोग किया और इस के कारण उनकी निन्दा होती या कोई मुकदमा चलाया जाता अथवा इस विषय में बहस होती तो बात और थी, परन्तु चर्चा का विषय महिला न होकर दलित महिला का हो गया है जिसकी निन्दा की जानी चाहिये। उन पर मुकदमा भी दलित अपमान का हुआ है गोया यदि उन्होने किसी दूसरी महिला जो दलित समाज से नही आती पर टिप्पणी की होती तो शायद इतना शोर न मचता नही, न ही तथाकथित निष्पक्ष समाचार देने वाले न्यूज चैनल इसकी निन्दा करते। यह बड़े शर्म की बात है कि रीता बहुगुणा के भाषण कि निन्दा होनी चाहिये थी महिला के प्रति अपमान जनक बात कहने की पर निन्दा हो रही है दलित महिला के प्रति अपमान जनक बात कहने की। क्या इस पर कोई विचार करने को तैयार है? आज के इस जातियों में बँटे समाज में शायद नहीं

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

केन्द्रीय बजट-एक तमाशा

वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी द्वारा प्रस्तुत केन्द्रीय बजट में भी ऐसा प्रतीत होता है कि केन्द्रीय सरकार ने अपने मिले वोटों का कर्ज चुकाने का प्रयास किया गया है। बजट की कुछ सुर्खियाँ निम्नवत है
• मदरसों के शिक्षकों का मानदेय तीन गुना किया गया।
• अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के केरल एवम् मुर्शिदाबाद में 25-25 करोड़ रुपये की लागत से कैम्पस बनाने की घोषणा।
• गरीबों की हितैषी सरकार अब क्रूड आयल के दाम बढ़ने पर उससे वसूल करेगी।
• डाक्टर व वकील की फीस में 10.24 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी।
• वित्त मंत्री के इन्द्रजाल का उल्टा असर शेयर बाजर पर, अच्छा गोता खाया।
• गरीबी घटाने नही, पूर्व प्रधान मंत्री श्रीमति इन्दिरा गाँधी के तर्ज पर गरीबी हटाने का वादा।
यह कुछ मुख्य बिन्दु हैं, वोटों के कर्ज को चुकाने का सिलसिला जारी है। टैक्स द्वारा वसूल किये गये धन का मुस्लिम तुष्टिकरण हेतु लुटाने के सिलसिले को जारी रखते हुए, वित्त मंत्री ने मुस्लिम संस्थाओं के आँगन में पैसों की बारिस कर दी है। बजट का घाटा इस कदर है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक गर्व से कह सकता है कि मेरे ऊपर लगभग 1200 रुपये का विदेशी कर्ज है। वैसे विदेशी चीजों का हमारे देश में बहुत क्रेज है फिर वह चाहे कर्ज ही क्यों न हो।
न्याय की आस में भटकने वालों के लिये एक शुभ सूचना है कि उन्हे मिलने वाले न्याय की कीमत 10.24 प्रतिशत बढ़ा दी गयी है, आखिर जब सभी वस्तुओं के दामों में बढ़ोत्तरी हो रही है तो न्याय को इससे अलग कैसे रखा जा सकता है, इसी प्रकार बार-बार डाक्टर के पास जाने वाले भी सावधान! भई बीमार मत पड़ो,यही शिक्षा दी है काबिल वित्त मंत्री जी ने। डाक्टरों की फीस में भी 10.24 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी करने का ऐलान है इस बजट में।
शेयर बाजार में धन लगाने वाले छोटे निवेशकों को भी जोर का झटका धीरे से लगा है, सेंसेक्स में 5.83 प्रतिशत की वृद्धि (ऋणात्मक ही सही) हुई है।
नई बोतल में पुरानी शराब परोसते हुए राष्ट्रीय ग्रामीण जीविका मिशन नाम की योजना लायी है, जिसके लागू होने पर हमारे देश से गरीबी ऐसे भाग जाएगी जैसे कभी थी ही नही। ऐसा पिछले कार्यकाल में ही हो जाता पर वाम मोर्चा ने कुछ होने नही दिया, इस बार से पूरे मन से प्रयास किये जायेंगे और देश से गरीबी गधे के सिर से सींग की तरह गायब कर दी जायेगी, ताकि अगले चुनाव में गरीबों का हाथ कांग्रेस के साथ जैसे नारों की जरूरत ही पड़े।

रविवार, 5 जुलाई 2009

एक वैश्य की कहानी

एक दिन की बात है, मैं कही जा रहा था, कहाँ जा रहा था यह बताने की आवश्यकता नही है। एक जगह देखा कि रास्ते में बड़ी भीड़ लगी है। उत्सुकतावश मैं भी वहाँ चला गया। वहाँ देखा तो पता चला कि एक आदमी सड़क के किनारे बने गड्ढे में गिर गया है, गड्ढा बहुत गहरा नही था पर इतना गहरा जरूर था कि वह आदमी खुद-ब-खुद नही निकल सकता था। मैंने वहाँ लगी भीड़ में से एक आदमी से पूछा कि क्या हो गया है? उसने जबाब दिया 'एक बावला सा आदमी गड्ढे में गिर गया है, लोग उसे निकालने का प्रयास कर रहें है पर वो है कि जैसे निकलने को तैयार ही नही, अजीब आदमी है'
मैं गड्ढे के नजदीक पहुँचा तो देखता हूँ कि कई आदमी गड्ढे के किनारे बैठ कर अपना हाथ गड्ढे में डाले चिल्ला रहे है, 'हाथ दे, हाथ दे, अबे हाथ क्यों नही देता'

मैंने गड्ढे में झाँका तो सारा माजरा समझ में आ गया। मैने वहाँ मौजूद लोगों से कहा – आप लोग चिन्ता न करें, इस आदमी को मैं पहचानता हूँ, और अभी गड्ढे से निकाल देता हूँ। आप लोग जरा किनारे हट जायँ ताकि मैं आराम से वहाँ बैठकर उससे बात कर सकूँ।
सारे आदमी वहाँ से हट गये, फिर मैंने अपना हाथ गड्ढे में लटका कर उस आदमी की ओर मुखातिब होकर कहा – लो रामलाल हाथ लो। इतना सुनते ही उसने लपक कर मेरा हाथ पकड़ लिया, और मैंने उसे गड्ढे के बाहर खींच लिया। उसके बाहर निकलते ही लोगों ने उसे घेर लिया और लगे बुरा-भला कहने। लोगों ने मुझे भी घेर लिया और कहने लगे कि वाह भई आप के हाथ में वह कौन सा जादू है जिससे इस आदमी को पलक झपकते ही गड्ढे से बाहर निकाल लिया, यह तो लगभग एक घन्टे से सबका खून पी रहा था। मैंने लोगों को राज की बात बताई। मैंने कहा – इस आदमी को मैं पहचानता था, यह हमारे कस्बे का बनिया रामलाल है। बनिया होने के नाते इसने कभी देने का नाम ही नही सुना, वह तो केवल लेना ही जानता है; इसीलिये मैंने इससे हाथ देने की बात ही नही की, जैसा आप लोग कर रहे थे। मैंने तो केवल यही कहा कि रामलाल हाथ लो, और इसने इतना सुनते ही झपट कर मेरा हाथ पकड लिया और बाहर आ गया।