शुक्रवार, 12 जून 2009

केन्द्र सरकार की स्वीकरोत्ति

आखिरकार नयी केन्द्र सरकार ने मुसलमानों के मिले वोट का कर्ज चुकाते हुए यह कबूल कर लिया कि संसद हमले का दोषी अफजल अपनी प्राकृतिक मौत ही मरेगा। दैनिक जागरण मे छपे समाचार के अनुसार केन्द्रीय मन्त्री वीरप्पा मोइली ने यह कबूल कर लिया कि अफजल को फाँसी देना केन्द्र सरकार के बूते में नही है। सन्दर्भ हेतु समाचार के कुछ अंश प्रस्तुत हैं।

    "आठ साल पहले संसद पर हुए आतंकी हमले के दोषी अफजल गुरू की फांसी में 25 साल भी लग
सकते हैं। निकट भविष्य में उसकी फांसी तो कतई संभव नहीं है। कानून मंत्री एम.
वीरप्पा मोइली ने इस बात की स्वीकरोत्ति दी हैं। बताते चलें कि राष्ट्रपति के पास इस समय 28 दया याचिकाएं लंबित हैं।"

    यह तो होना ही था, इसमे आश्चर्य करने जैसी कोई बात नही है। सुरक्षा एजेन्सियाँ जिन आतंकवादियों को जान हथेली पर रखकर पकड़ती है, कांग्रेस नीत सरकार उनकी सेवा मे जुट जाती है, आखिर वोट का सवाल है। पृथ्वीराज के युग में तो एक जयचन्द था, इस युग मे तो जयचन्दों की भीड़ है। आखिर आतंकियों को उनके मंजिल तक सुरक्षित रख हिन्दुस्तान को दारुल हरब से दारुल इस्लाम बनाने मे मदद जो करनी है।

    असली गलती तो सुरक्षा बलों की है कि वे उन आतंकवादियों को पकड़ते क्यों हैं, उन्हे मार क्यों नही देते। उन्हें पकड़कर ऐसे मुस्लिम वोट के लोभी नेताओं को मेहमान नवाजी का अवसर क्यों देते हैं।


 

रविवार, 19 अप्रैल 2009

दोहरी मानसिकता वाला चुनाव आयोग

मुख्य चुनाव आयुक्त का कथन कि वरुण गाँधी का बयान जहरीला था। चुनाव आयोग का यह कथन अपेक्षा के अनुरूप है क्योंकि उन्होने पहले ही भाजपा को बिना मांगे ही सलाह दे दी थी कि वरुण गाँधी को प्रत्याशी न बनाया जाय। चुनाव आयोग को लालू का बयान जो उन्होने पूर्व मे दिया था और एक बयान अभी आया है कि ‘आडवानी जी तो रिफ्यूजी है असली हिन्दू तो हम है’, शायद शहद के स्वाद जैसा लगेगा क्योंकि चुनाव आयोग दोहरी मानसिकता वाले आयुक्तों से इससे अधिक की अपेक्षा नही की जा सकती।
आंन्ध्र प्रदेश सोनिया पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का बयान ‘अगर किसी ने मुसलमानों की तरफ उंगली उठायी तो उसका हाथ काट डालेंगे‘, चुनाव आयोग को किसी प्रवचन की भाँति लगा शायद इसीलिए उन्होने इस पर चुप्पी साधना आवश्यक समझा। वरुण गाँधी का बयान तो इन तथाकथित सेक्युलर नेताओं के बयान के आगे कुछ भी नही था। बिहार की, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी (प्रदेश पर थोपी गई, क्योंकि यदि लालू चारा घोटाले में न फँसते तो उनका मुख्यमंत्री बनना असम्भव था) ने तो गाली बकनी शुरु कर दिया है। ये बौखलाये व जनाधार खोते नेता अब आँय-बाँय बक रहे हैं। चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया आपेक्षित है।
उपकृत चुनाव आयोग से और अपेक्षा ही क्या हो सकती है?

रविवार, 12 अप्रैल 2009

चुनाव मे बावले होते नेता

अभी एक समाचार पढ़ा जिसमे भारत के वर्तमान विदेश मन्त्री प्रणव मुखर्जी ने असम के सिलचर मे कांग्रेस के बुद्धि-परजीवी (तथाकथित बुद्धिजीवी) की बैठक मे एक रहस्योद्घाटन किया कि हिन्दुत्व भारतीयों का दर्शन नही है। इस खोज के लिए वर्तमान सरकार संभवतः इनका नाम नोबुल प्राइज के लिए नामित करने का प्रयास करेगी। अच्छा हुआ प्रणव ने यह बता दिया नही तो अभी लोग इसी भ्रम मे थें कि हिन्दू सनातन धर्म है और हिन्दुतव का दर्शन भारत का मूल दर्शन है। लेकिन मंत्री जी आखिर ठहरे संकुचित सोच वाले नेता। वही थूक कर भाग जाने वाली बात करी है, लगे हाथ उन्हे यह भी बताना चाहिए कि आखिर हिन्दुत्व कहाँ का मूल दर्शन है और भारतीयो का मूल दर्शन क्या हैं। वोटों की इस मंडी मे अगर वे इसको भी बताते तो शायद कुछ वोटों का फायदा भी हो सकता था। मंत्री जी मैकाले के मानस पुत्रों की श्रृंखला मे से ही एक हैं, उनके ज्ञान दर्शन का इतिहास तो अंग्रेजों की या इससे पूर्व मुसलमानों की गुलामी से ही प्रारम्भ होता है। इसके पूर्व तो वे जा ही नही सकते। अपने देश के पूर्व इतिहास की बातें तो इन्हे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा गढ़ी हुई लगती होंगी। वोटों की इस गंदी राजनीति मे नेता इस स्तर तक गिर जायेंगे इसकी उम्मीद शायद किसी ने न की थी। प्रणव इसके अपवाद नही हैं, हम भारतीय,हजारों सालों के मुसलमानों और अंग्रेजों की गुलामी को अपने खून मे मिला लिया है। अब तो अपने भाईयों के लिए इनका खून गर्म भी नही होता। शायद इन्हें अपने पूर्वजों पर क्रोध भी आता होगा, कि उन्होने इन्हे हिन्दू संतान के रूप में क्यों पैदा किया।

एक और समाचार- मोदी ने कांग्रेस को बुढ़िया क्या कह दिया, ऐसा लगता है कि जैसे आसमान फट पड़ा। महिला आयोग को बुरा लगा, आयोग की महिलाओं ने उनको कोसना शुरू कर दिया। भला कोई उनसे पूछे कि ऐसा क्या कह दिया कि ये महिलाएं आसमान सर पर उठा रही हैं, शायद उन्हे आने वाले अपने बुढ़ापे का ध्यान आ गया होगा। उन महिला सदस्यों से कोई यह पूछे कि ने अपने बूढ़ी सास की कितनी सेवा करती हैं, शायद हजार में कोई एक होगी, लेकिन छपास रोग से पीड़ित महिला आयोग अपनी बाँहे चढ़ा रहा है। इधर प्रियंका बढ़ेरा ने अमेठी मे लोगों से पूछा कि क्या वे बूढ़ी लग रही हैं। अब भला प्रियंका को कौन कहे कि मोदी ने 125 वर्ष की कांग्रेस को बूढ़ी कहा था, कही प्रियंका बढ़ेरा स्वयं को कांग्रेस तो नही समझ रही हैं, वैसे अगर वे ऐसा समझती है तो कांग्रेस के लिए कोई नयी बात नही है। गांधी परिवार के अतिरिक्त कांग्रेस में है क्या? लेकिन राहुल गांधी के किए खतरे की घंटी बज सकती है। अगर प्रियंका बढ़ेरा ने कांग्रेस पर कब्जा कर लिया तो क्या होगा, कांग्रेस की कमान गांधी परिवार से निकल कर बढ़ेरा परिवार मे चली जाएगी और राहुल गांधी की स्थिति अर्जुन सिंह जैसी हो जायेगी।

चन्द वोटों के लिए देश की अस्मत का सौदा करने वाले तथाकथित सेक्युलर नेता, वोटों की मंडी मे आगे निकलने के लिए आने वाले दिनों मे ओसामा बिन लादेन को अपना आदर्श और बैतुल्लाह महसूद को अपना सर्वसम्मति से चुना नेता बताने लगें तो कोई आश्चर्य नही।

मंगलवार, 13 जनवरी 2009

भारत के लोकतंत्र का दर्द

1.   हत्यारे मुख्य मंत्री बने हैं।

2.   जिनको जेल मे सड़ना चाहिए, वे आजाद लोगों को जेल भिजवा रहे हैं।

3.   विदेशी वैज्ञानिकों ने रोबोट बनाए जो अनेक कार्य कर सकते हैं जैसे कारखाने मे, खेल मे पर हमारे देश में एक विदेशी जो वैज्ञानिक नही है, उसने ऐसा रोबोट बनाया जो देश चला रहा है।

4.   जिनसे पूरा क्षेत्र भयभीत होता है, जिन्हें देख लोग घरों मे छिपते हैं, उनकी सुरक्षा जेड प्लस सेक्योरिटी से होती है।

5.   जेल मे बन्द कैदी जिसके रिहाई की अपील अदालत मे रद्द होती थी, अचानक जुगाड़ से मुख्य मंत्री बन जाता है।

6.   आतंकवाद की घटनाओं के बाद यहाँ के टेलीविजन चैनल सुरक्षा कार्यवाही का लाइव टेलीकास्ट कर आतंकी के आकाओं को पल पल की सूचना पहुँचा कर अपना तथाकथित टी.आर.पी. बढ़ाते हैं।

7.   आतंकी जो सैकड़ो निरीह देशवासियों की जान लेता है उसे बचाने हेतु तथाकथित मानवाधिकारी व वोट बैंक के भूखे तथाकथित सेक्युलर नेता आगे आ जाते हैं।

 

दर्द और भी बहुत हैं, फिर कभी

 

सोमवार, 12 जनवरी 2009

शेखावत का तमाशा


 

पराई आग में रोटी सेंकना शायद इसे ही कहते हैं, शेखावत के निम्न स्तर का राजनीति को भरपूर समर्थन देने रा.कां.पा. आ गई। उनहोने यह कह दिया कि उपराष्ट्रपति बनने के पूर्व शेखावत जी ने भा.ज.पा. से इस्तीफा दे दिया था। रा.कां. पा. के महासचिव डी.पी.त्रिपाठी भला ऐसा स्वर्णिम अवसर कैसे गवां सकते थे, सो उन्होने शेखावत के इस कदम का स्वागत किया और उनके लिए समर्थन जुटाने का वादा भी किया। शेखावत को इसका आभार जताना चाहिए के आखिर कोई तो उन्हे अपना घर जलाने के लिए पेट्रोल देने का वायदा किया।

शेखावत जी अपने कदम वापस खीचेंगे, इसकी संभावना कम है परन्तु अभी इस पर कुछ कहा नही जा सकता। कहते हैं इतिहास स्वयं को दोहराता है, शेखावत जी इसे साबित करने पर तुले हुए हैं। पूर्व में भी अपने यहाँ जयचन्द थे, अब नये स्वरूप में शेखावत के नाम से आए हैं। सत्ता का इतना मोह इस वयोवृद्ध नेता को हो गया है कि उन्हे अपना बुरा भला नही देख पा रहे,तथा पार्टी को सत्यानास करने पर तुल गये हैं। कब्र में पॉव लटके हुए हें, किन्तु प्रधान मंत्री का दिवा स्वप्न ठीक दुर्योधन की भाँति देख रहे है भले ही इसकी बड़ी कीमत पार्टी को चुकानी पड़ जाय।

जिस प्रकार पेड़ में अपनी शाखा से अलग होकर कोई डाली हरी भरी नही रह सकती, कुछ ही दिनों मे सूख जाती है तथा उससे पेड़ का कुछ नही बिगड़ता, उसी प्रकार शेखावत जी, जिस पार्टी के सहारे अपनी राजनीतिक स्थिति बढ़ाई उससे बगावत कर स्वयं अपना विनास कर लेंगे। शेखावत नाम की बीमारी का उसी प्रकार इलाज होना चाहिए जिस प्रकार शरीर के किसी अंग मे पनप रहे नासूर का होता है। शेखावत जी संभलो नही तो नाम लेने वाला कोई नही मिलेगा।

रविवार, 11 जनवरी 2009

भाजपा की मुसीबत

आजकल भैरोसिंह शेखावत को क्या हो गया है। वे बिना किसी बात के भाजपा के लिए मुसीबत बन रहे हैं। ऐसा लगता है कि वे छपास रोग से पीड़ित हो गए हैं, उन्हें आराम की बहुत जरूरत है। एक वयोवृद्ध संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता को ऐसा आचरण करना कुछ समझ में नहीं आता। वे उपराष्ट्रपति पद को सुशोभित कर चुके हैं व राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रह चुके हैं, उन्हें अब लोकसभा के चुनाव लड़ने की क्या सूझी है? वे भाजपा के वरिष्ठ नेता हें उनका मूल मकसद पार्टी को सही राह दिखाना होना चाहिये, परन्तु वे अकारण ही पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी कर रहे हैं। एक पुरानी कहावत है ’सूत न कपास, जुलाहों मे लठ्ठम लठ्ठा’ वही हाल यहाँ है। आगामी चुनाव में क्या होगा, अभी से इसके बारे में कुछ कहना अतिशयोक्ति होगा, परन्तु शेखावत जी को प्रधान मंत्री के सपने आने शुरु हो गये। निम्न स्तर के नेता से तो ऐसा उम्मीद की जा सकती है, जिसका मूल मकसद किसी न किसी प्रकार चर्चा बना रहना होता है, परन्तु उनके जैसे वरिष्ट नेता का ऐसा आचरण करना शोभा नहीं देता।

माना कि भाजपा में कई अवगुण घर कर रहे हैं, उन जैसो का कार्य उन अवगुणों को दूर करना होना चाहिए न कि पार्टी के लिये संकट पैदा करना। उनका यह कहना, कि वे तब से राजनीति में हैं जब राजनाथ सिंह पैदा भी नही हुये थे, कहीं न कहीं ओछी मानसिकता का द्योतक है। उनके मन मे अवश्य ही यह चुभन उठी कि मैं बड़ा हूं और मुझसे अधिक ज्ञानी कोई और कैसे हो सकता है।

अपने देश में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति से बड़ा कोई अन्य संवैधानिक पद नही है, इस पद को सुशोभित कर चुके व्यक्ति के मन में ऐसे विचार आना क्या संकेत देता है? शेखावत जी ने ऐसी बयान बाजी कर के खुद को हम जैसे करोड़ो लोगों की नजरों मे गिरा लिया। अपने लम्बे राजनीतिक जीवन में कमाई हुई संपदा को पल भर में मिट्टी मे मिला दिया। उनके जैसे व्यक्ति, ऐसे विचार व्यक्त कर समाज व भविष्य के राजनीतिक कर्णधारों को क्या संदेश देना चाहते हैं?  

जिस प्रकार किसी बालक की पहचान उसके माता पिता से होती है, उसी प्रकार किसी भी संस्था से जुड़े व्यक्ति की पहचान उसके संस्था से होती है। कभी- कभी किसी का दिमाग घूमने पर उसे लगता है कि उसका वजूद संस्था से नही बल्कि संस्था का वजूद उससे है, बस यहीं से उसका पतन प्रारम्भ हो जाता है। शायद शेखावत जी को भी यही लग रहा है कि उनसे ही संस्था का वजूद है, इसीलिए बिना सिर पैर की बात कह कर पार्टी को बरबाद करने पर तुल गये हैं। हो सकता है कि उनके दिमाग में कोई कीड़ा घुस गया हो और वे बहक गये हों। ऐसे में उनका इलाज करना आवश्यक है अन्यथा वे इस रोग के कीड़े का संवाहक बन कर अनेकों को बीमार कर देंगे।

राजनाथ सिंह ने जो कहा है कि उच्च संवैधानिक पद को सुशोभित करने के बाद लोकसभा का चुनाव लड़ने की इच्छा व्यक्त करना, गंगा स्नान करने के बाद कुएं पर स्नान करने के बराबर है, तनिक भी अनुचित प्रतीत नहीं होता। इस कथन पर शालीनता से विचार करने के बजाय उन्होने तीखी प्रतिक्रिया करते हुये कह दिया कि वे तब से राजनीति मे हैं जब राजनाथ सिंह जब पैदा ही नही हुये थे। यह कह कर वे क्या जताना चाह रहे हैं?, यही न कि वे बहुत वरिष्ठ हैं और उन्हे सब कुछ करने का अधिकार है? अरे शेखावत जी उम्र मे बड़ा होने से कोई बड़ा नहीं हो जाता, बड़ा होने का मतलब यह है के वे बड़प्पन दिखाएं, न कि अत्यन्त निम्न स्तर की राजनीति करें।

शेखावत जी द्वारा लोकसभा के चुनाव लड़ने की बात कहना व उसे कुतर्क से सही सिद्ध करना अत्यन्त निन्दनीय है, ऐसे निन्दनीय कृत्य कर अगर वे अपने आप को वरिष्ठ नेता होने की बात करते हैं तो यह उनके मानसिक दिवालियेपन का द्योतक है, ऐसा कर वे खुद अपना व संस्था का अहित कर रहे हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि उन्होने अपने बड़प्पन को मिट्टी में मिला दिया है, उन्हे अच्छी सीख देने वाले का वे वही हाल करने पर उतारू हैं जैसे कि बन्दर ने बया के घोंसले का किया था।

शेखावत जी ने अपने आप को इतना छोटा कर दिया है कि, वे कुएं को कौन कहे गन्दे नाले में स्नान करने को उतारू हैं। भगवान उन्हे सत्बुद्धि दे।