प्रधानमंत्री जी, आप इतने भोले-मासूम और ईमानदार नहीं हैं, जितना प्रचारित करते हैं… (सन्दर्भ :- मारन और राजा की पत्रावलियाँ)(भाग - 1)(प्रिय पाठकों :- सावधानीपूर्वक ध्यान लगाकर पढ़िये कि किस तरह मारन और राजा ने 2जी का घोटाला किया, जिसकी पूर्ण जानकारी प्रधानमंत्री, वाणिज्य मंत्री और वित्तमंत्री को थी… लेख अधिक लम्बा है इसलिए इसे दो भागों में बाँट रहा हूँ ताकि पाठक अधिक ध्यान से पढ़ सकें और मामला समझ सकें) 2जी लाइसेंस देने की प्रक्रिया की शुरुआत से लेकर अन्त तक दयानिधि मारन ने जितनी भी अनियमितताएं और मनमानी कीं उसमें प्रधानमंत्री की पूर्ण सहमति, जानकारी और मदद शामिल है, ऐसे में प्रधानमंत्री स्वयं को बेकसूर और अनजान बताते हैं तो यह बात गले उतरने वाली नहीं है।अथ 2G कथा भाग-1 प्रारम्भ…हमारे अब तक के सबसे "ईमानदार" कहे जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अक्सर भ्रष्टाचार का मामला उजागर होने के बाद या तो साफ़-साफ़ अपना पल्ला झाड़कर अलग हो जाते हैं, अथवा उनके "पालतू भाण्ड" टाइप के अखबार और पत्रिकाएं, उन्हें "ईमानदार" होने का तमगा तड़ातड़ बाँटने लगते हैं। प्रधानमंत्री स्वयं भी खुद को भ्रष्टाचार के ऐसे "टुटपूंजिये" मामलों से बहुत ऊपर समझते हैं, वे अपने-आप को "अलिप्त" और "पवित्र" बताने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते…। उनका "सीजर की पत्नी" वाला चर्चित बयान तो अब एक मखौल सा लगता है, खासकर उस स्थिति में जबकि लोकतन्त्र में जिम्मेदारी "कप्तान" की होती है। जिस प्रकार रेल दुर्घटना के लिए रेल मंत्री या कोई वरिष्ठ अधिकारी ही अपने निकम्मेपन के लिए कोसा जाता है। उसी प्रकार जब पूरे देश में चौतरफ़ा लूट चल रही हो, नित नये मामले सामने आ रहे हों, ऐसे में "सीजर की पत्नी" निर्लिप्त नहीं रह सकती न ही उसे बेगुनाह माना जा सकता है। मनमोहन सिंह को अपनी जिम्मेदारी निभानी ही चाहिए, परन्तु ऐसा नहीं हो रहा। यदि डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी और सुप्रीम कोर्ट सतत सक्रिय न रहें और निगरानी न बनाए रखते, तो 2G वाला मामला भी बोफ़ोर्स और हसन अली जैसा हश्र पाता…और अब तो जैसे-जैसे नए-नए सबूत सामने आ रहे हैं, उससे साफ़ नज़र आ रहा है कि प्रधानमंत्री जी इतने "भोले, मासूम और ईमानदार" भी नहीं हैं जितने वे दिखने की कोशिश करते हैं। दूरसंचार मंत्री रहते दयानिधि मारन ने अपने कार्यकाल में जो गुलगपाड़े किये उनकी पूरी जानकारी मनमोहन सिंह को थी, इसी प्रकार ए राजा (जो कि शुरु से कह रहा है कि उसने जो भी किया चिदम्बरम और मनमोहन सिंह की पूर्ण जानकारी में किया) से सम्बन्धित दस्तावेज और अफ़सरों की फ़ाइल नोटिंग दर्शाती है कि मनमोहन सिंह न सिर्फ़ सब जानते थे, बल्कि उन्होंने अपनी तरफ़ से इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया (हालांकि मामला उजागर होने के बाद भी वे कौन सा तीर मार रहे हैं?)। 2जी घोटाला (2G Spectrum Scam) उजागर होने के बावजूद प्रधानमंत्री द्वारा ए. राजा की पीठ सरेआम थपथपाते इस देश के लोगों ने टीवी पर देखा है…।इस बात के पर्याप्त तथ्य और सबूत हैं कि ए राजा के मामले के उलट, जहाँ कि प्रधानमंत्री और राजा के बीच पत्र व्यवहार हुए और फ़िर भी राजा ने प्रधानमंत्री की सत्ता को अंगूठा दिखाते हुए 2G स्पेक्ट्रम मनमाने तरीके से बेच डाले… दयानिधि मारन के मामले में तो स्वयं प्रधानमंत्री ने इस आर्थिक अनियमितता में मारन का साथ दिया, बल्कि स्पेक्ट्रम खरीद प्रक्रिया में मैक्सिस को लाने और उसके पक्ष में माहौल खड़ा करने के लिये नियमों की तोड़मरोड़ की, कृत्रिम तरीके से स्पेक्ट्रम की दरें कम रखी गईं, फ़िर मैक्सिस कम्पनी को लाइसेंस मिल जाने तक प्रक्रिया को जानबूझकर विकृत किया गया। बिन्दु-दर-बिन्दु देखिए ताकि आपको आसानी से समझ में आए, देश को चूना कैसे लगाया जाता है…1) दयानिधि मारन ने डिशनेट कम्पनी के सात लाइसेंस आवेदनों की प्रक्रिया रोके रखी –दयानिधि मारन ने डिशनेट कम्पनी द्वारा प्रस्तुत लाइसेंस आवेदनों पर ढाई साल तक कोई प्रक्रिया ही नहीं शुरु की, कम्पनी से विभिन्न प्रकार के प्रश्न पूछ-पूछ कर फ़ाइल अटकाये रखी, यह बात शिवराज समिति की रिपोर्ट में भी शामिल है। मारन ने शिवशंकरन को इतना परेशान किया कि उसने कम्पनी में अपना हिस्सा बेच डाला।2) मैक्सिस कम्पनी को आगे लाने हेतु विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाई –मैक्सिस कम्पनी को लाइसेंस पाने की दौड़ में आगे लाने हेतु दयानिधि मारन ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ा दिया, यह कार्रवाई कैबिनेट की बैठक में 3 नवम्बर 2005 के प्रस्ताव एवं नोटिफ़िकेशन के अनुसार की गई जिसमें प्रधानमंत्री स्वयं शामिल थे और उनकी भी इसमें सहमति थी।3) मैक्सिस के लिये UAS लाइसेंस गाइडलाइन को बदला गया –मारन ने मैक्सिस कम्पनी को फ़ायदा पहुँचाने के लिये लाइसेंस शर्तों की गाइडलाइन में भी मनमाना फ़ेरबदल कर दिया। मारन ने नई गाइडलाइन जारी करते हुए यह शर्त रखी कि 14 दिसम्बर 2005 को भी 2001 के स्पेक्ट्रम भाव मान्य किये जाएंगे (जबकि इस प्रकार लाइसेंस की शर्तों को उसी समय बदला जा सकता है कि धारा 11(1) के तहत TRAI से पूर्व अनुमति ले ली जाए)। दयानिधि मारन ने इन शर्तों की बदली सिर्फ़ एक सरकारी विज्ञापन देकर कर डाली। इस बात को पूरी कैबिनेट एवं प्रधानमंत्री जानते थे।इस कवायद का सबसे अधिक और एकमात्र फ़ायदा मैक्सिस कम्पनी को मिला, जिसने दिसम्बर 2006 में ही 14 नवीन सर्कलों में UAS लाइसेंस प्राप्त किये थे।4) मैक्सिस कम्पनी ने शिवशंकरन को डिशनेट कम्पनी से खरीद लिया था, और इस बात का उल्लेख और सबूत सीबीआई के कई दस्तावेजों में है, जिसे सुप्रीम कोर्ट में पेश किया जा चुका है।5) 11 जनवरी 2006 को जैसे ही मैक्सिस कम्पनी ने डिशनेट को खरीद लिया, मारन ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा जिसमें मंत्रियों के समूह के गठन की मांग की गई ताकि एयरसेल को अतिरिक्त स्पेक्ट्रम आवंटित किया जा सके। मारन को पता चल गया था कि वह कम्पनी को लाइसेंस दे सकते हैं, लेकिन उन्हें स्पेक्ट्रम नहीं मिलेगा। दयानिधि मारन को पक्का पता था कि स्पेक्ट्रम उस समय सेना के पास था, तकनीकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय का प्रभार होने के कारण दयानिधि मारन लाइसेंस के आवेदनों को ढाई वर्ष तक लटका कर रखे रहे, लेकिन जैसे ही मैक्सिस कम्पनी ने डिशनेट को खरीद लिया तो सिर्फ़ दो सप्ताह के अन्दर ही लाइसेंस जारी कर दिये गये। साफ़ है कि इस बारे में प्रधानमंत्री सब कुछ जानते थे, क्योंकि सभी पत्र व्यवहार प्रधानमंत्री को सम्बोधित करके ही लिखे गए हैं।6) मारन ने मैक्सिस कम्पनी को “A” कैटेगरी सर्कल में चार अतिरिक्त लाइसेंस लेने हेतु प्रोत्साहित किया। मारन ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा उसके अगले दिन ही यानी 12 जनवरी 2006 को मैक्सिस (डिशनेट) ने “ए” कैटेगरी के सर्कलों के लिए 4 आवेदन डाल दिये, जबकि उस समय कम्पनी के सात आवेदन पहले से ही लम्बित थे। इस प्रकार कुल मिलाकर मैक्सिस कम्पनी के 11 लाइसेंस आवेदन हो गये।7) 1 फ़रवरी 2006 को दयानिधि मारन स्वयं प्रधानमंत्री से व्यक्तिगत रूप से मिले, ताकि मंत्री समूह में उनके एजेण्डे पर जल्दी चर्चा हो।8) प्रधानमंत्री ने मंत्री समूह को चर्चा हेतु सन्दर्भ शर्तों (Terms of Reference) की घोषणा की तथा उन्हें स्पेक्ट्रम की दरों पर पुनर्विचार करने की घोषणा की –11 जनवरी 2006 के पत्र एवं 1 फ़रवरी 2006 की व्यक्तिगत मुलाकात के बाद 23 फ़रवरी 2006 को प्रधानमंत्री ने स्पेक्ट्रम की दरों को तय करने के लिए मंत्री समूह के गठन की घोषणा की, जो कि कुल छः भाग में थी। इस ToR की शर्त 3(e) में इस बात का उल्लेख किया गया है कि, “मंत्री समूह स्पेक्ट्रम की दरों सम्बन्धी नीति की जाँच करे एवं एक स्पेक्ट्रम आवंटन फ़ण्ड का गठन किया जाए। मंत्री समूह से स्पेक्ट्रम बेचने, उस फ़ण्ड के संचालन एवं इस प्रक्रिया में लगने वाले संसाधनों की गाइडलाइन तय करने के भी निर्देश दिये। इस प्रकार यह सभी ToR दयानिधि मारन की इच्छाओं के विपरीत जा रही थीं, क्योंकि दयानिधि पहले ही 14 दिसम्बर 2005 को UAS लाइसेंस की गाइडलाइनों की घोषणा कर चुके थे (जो कि गैरकानूनी थी)। मारन चाहते थे कि UAS लाइसेंस को सन 2001 की दरों पर (यानी 22 सर्कलों के लिये सिर्फ़ 1658 करोड़) बेच दिया जाए।9) अपना खेल बिगड़ता देखकर मारन ने प्रधानमंत्री को तत्काल एक पत्र लिख मारा जिसमें उनसे ToR (Terms of References) की शर्तों के बारे में तथा ToR के नये ड्राफ़्ट के बारे में सवाल किये। प्रधानमंत्री और अपने बीच हुई बैठक में तय की गई बातों और ToR की शर्तों में अन्तर आता देखकर मारन ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर पूछा कि – “माननीय प्रधानमंत्री जी, आपने मुझे आश्वासन दिया था कि ToR की शर्तें ठीक वही रहेंगी जो हमारे बीच हुई बैठक में तय की गई थीं, परन्तु मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ है कि जो मंत्री समूह इस पर गठित किया गया है वह अन्य कई विस्तारित शर्तों पर भी विचार करेगा। मेरे अनुसार सामान्यतः यह कार्य इसी मंत्रालय द्वारा ही किया जाता है…”। आगे दयानिधि मारन सीधे-सीधे प्रधानमंत्री को निर्देश देते लगते हैं, “कृपया सभी सम्बद्ध मंत्रियों एवं पक्षों को यह निर्देशित करें कि जो ToR “हमने” तय की थीं (जो कि साथ में संलग्न हैं) उन्हीं को नए सिरे से नवीनीकृत करें…”। दयानिधि मारन ने जो ToR तैयार की, उसमें सिर्फ़ चार भाग थे, जबकि मूल ToR में छः भाग थे, इसमें दयानिधि मारन ने नई ToR भी जोड़ दी, “डिजिटल क्षेत्रीय प्रसारण हेतु स्पेक्ट्रम की अतिरिक्त जगह खाली रखना…”। असल में यह शर्त और इस प्रकार का ToR बनाना दूरसंचार मंत्रालय का कार्यक्षेत्र ही नहीं है एवं यह शर्त सीधे-सीधे कलानिधि मारन के “सन टीवी” को फ़ायदा पहुँचाने हेतु थी। परन्तु इस ToR की मनमानी शर्तों और नई शर्त जोड़ने पर प्रधानमंत्री ने कोई आपत्ति नहीं उठाई, जो सन टीवी को सीधे फ़ायदा पहुँचाती थी। अन्ततः सभी ToR प्रधानमंत्री की अनुमति से ही जारी की गईं, प्रधानमंत्री इस बारे में सब कुछ जानते थे कि दयानिधि मारन “क्या गुल खिलाने” जा रहे हैं।10) विदेशी निवेश बोर्ड (FIPB) द्वारा मैक्सिस कम्पनी की 74% भागीदारी को हरी झण्डी दी -मार्च-अप्रैल 2006 में मैक्सिस कम्पनी में 74% सीधे विदेशी निवेश की अनुमति को FIPB द्वारा हरी झण्डी दे दी गई। इसका साफ़ मतलब यह है कि न सिर्फ़ वाणिज्य मंत्री इस 74% विदेशी निवेश के बारे में जानते थे, बल्कि गृह मंत्रालय भी इस बारे में जानता था, क्योंकि उनकी अनुमति के बगैर ऐसा हो नहीं सकता था। ज़ाहिर है कि इस प्रकार की संवेदनशील और महत्वपूर्ण जानकारी प्रधानमंत्री सहित कैबिनेट के कई मंत्रियों को पता चल गई थी। प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा इस तथ्य की कभी भी पड़ताल अथवा सवाल करने की कोशिश नहीं की गई कि मैक्सिस कम्पनी 99% विदेशी निवेश की कम्पनी थी, 74% विदेशी निवेश तो सिर्फ़ एक धोखा था क्योंकि बचे हुए 26% निवेश में सिर्फ़ “नाम के लिए” अपोलो कम्पनी के रेड्डी का नाम था। यह जानकारी समूची प्रशासनिक मशीनरी, मंत्रालय एवं सुरक्षा सम्बन्धी हलकों को थी, परन्तु प्रधानमंत्री ने इस गम्भीर खामी की ओर उंगली तक नहीं उठाई, क्यों?11) अप्रैल से नवम्बर 2006 तक कोई कदम नहीं उठाया –दयानिधि मारन चाहते तो 14 दिसम्बर 2005 की UAS लाइसेंस गाइडलाइन के आधार पर आसानी से मैक्सिस कम्पनी के सभी 14 लाइसेंस आवेदनों को मंजूरी दे सकते थे, परन्तु उन्होंने ऐसा जानबूझकर नहीं किया, क्योंकि ToR की शर्तों में “स्पेक्ट्रम की दरों का पुनरीक्षण होगा” भी शामिल थी। FIPB की विदेशी निवेश मंजूरी के बाद भी दयानिधि मारन ने लाइसेंस आवेदनों को रोक कर रखा। साफ़ बात है कि इन 8 महीनों में प्रधानमंत्री कार्यालय पर जमकर दबाव बनाया गया जो कि हमें नवम्बर 2006 के बाद हुई तमाम घटनाओं में साफ़ नज़र आता है।12) दयानिधि मारन ने ToR की शर्तों का नया ड्राफ़्ट पेश किया –16 नवम्बर 2006 को दयानिधि मारन ने अवसर का लाभ उठाते हुए मंत्री समूह के समक्ष एक नया ToR शर्तों का ड्राफ़्ट पेश किया, जिसमें स्पेक्ट्रम की कीमतों के पुनरीक्षण वाली शर्त हटाकर क्षेत्रीय डिजिटल प्रसारण वाली शर्त जोड़ दी। इस प्रकार यह ToR वापस पुनः उसी स्थिति में पहुँच गई जहाँ वह 28 फ़रवरी 2006 को थी। ज़ाहिर है कि ToR की इन नई शर्तों और नये ड्राफ़्ट की जानकारी प्रधानमंत्री को थी, क्योंकि ToR की यह शर्तें प्रधानमंत्री की अनुमति के बिना बदली ही नहीं जा ***ती थीं। 13) इस बीच दयानिधि मारन ने अचानक जल्दबाजी दिखाते हुए 21 नवम्बर 2006 को मैक्सिस कम्पनी के लिये सात Letter of Intent (LoI) जारी कर दिये, क्योंकि मारन को पता था कि ToR की नई शर्तें जो कि 16 नवम्बर 2006 को नये ड्राफ़्ट में प्रधानमंत्री और मंत्री समूह को पेश की गई हैं, वह मंजूर हो ही जाएंगी। मैक्सिस कम्पनी के बारे में यह सूचना प्रेस और आम जनता को हो गई थी, परन्तु प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं किया।14) दयानिधि मारन ने 29 नवम्बर 2006 को (यानी ठीक आठ दिन बाद ही) मैक्सिस कम्पनी को बचे हुए सात लाइसेंस आवेदनों पर LoI जारी कर दिया।15) 5 दिसम्बर 2006 को मारन ने मैक्सिस को सन 2001 के भाव में सात लाइसेंस भी जारी कर दिये, क्योंकि मारन अच्छी तरह जानते थे कि मंत्री समूह अब ToR की नई शर्तों पर विचार अथवा स्पेक्ट्रम की दरों का पुनरीक्षण करने वाला नहीं है। मारन को स्वयं के बनाये हुए फ़रवरी और नवम्बर 2006 में पेश किये गये दोनों ड्राफ़्टों को ही मंजूरी मिलने का पूरा विश्वास पहले से ही था, और ऐसा प्रधानमंत्री के ठोस आश्वासन के बिना नहीं हो सकता था।बहरहाल, इतने घोटालों, महंगाई, आतंकवाद और भ्रष्टाचार के बावजूद पिछले 7 साल में हमारे माननीय प्रधानमंत्री सिर्फ़ एक बार "आहत"(?) हुए हैं और उन्होंने अपने इस्तीफ़े की पेशकश की है… याद है कब? नहीं याद होगा… मैं याद दिलाता हूँ… "सीजर की पत्नी" ने कहा था कि "यदि अमेरिका के साथ भारत का परमाणु समझौता पास नहीं होता तो मैं इस्तीफ़ा दे देता…"। अब आप स्वयं ही समझ सकते हैं कि उन्हें किसकी चिंता ज्यादा है?
रविवार, 25 सितंबर 2011
कथित ईमानदार पुतला
गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011
सूत्र वाक्य
(इस तरह सार यही है कि अगर व्यक्ति अकाल मौत से बचना चाहे तो सबसे पहले स्वभाव और बोल के दोष से हमेशा बचे।)
मंगलवार, 27 अप्रैल 2010
गुण्डों ओर मवालियों के हाथ जाता देश
दोनों अपनी पुरानी शैली में हुई, दोनो के परिणाम आपेक्षित थे। भारत बन्द के दौरान पूरे देश के गुण्डों के हवाले कर दिया गया, और कटौती प्रस्ताव मे सरकार की जीत हुई। समाजवादी पार्टी व राजद ने मुख्य तौर पर बन्द का आयोजन किया था। पुरानी स्मृतियों को ताजा करते हुए समाजवादी पार्टी व राजद के गुण्डे जहाँ तक सम्भव हो सका आगजनी करते रहे। सरकारी बसें जलाई गयी करोड़ों की सम्पत्ति की क्षति की गयी। केन्द्र सरकार की नीतियों के विरुद्ध आयोजित इस बन्द को देखकर कहीं से भी यह नही लगा कि ये केन्द्र सरकार का विरोध कर रहें है, इन्होने तो आम जन जिनके लिए ही बन्द का आयोजन किया गया था को लाचार कर दिया कि या तो हमारे साथ चलो या फिर जलती बस की तरह जलो। उक्त गुण्डागर्दी का नेतृत्व हमारे देश की तथाकथित आम जनों के हित करने वाली पर्टियाँ ही कर रही थीं। आम जन लाचार इन्हें देख रहा था। तुर्रा यह कि, यह भारत ‘गुण्डई से’ बन्द का प्रदर्शन आम जन के हितों की रक्षा के लिये किया गया था। मँहगाई से जूझ रही देश की निरीह जनता, पेट्रोल व डीजल के बढ़े दामों का विरोध करने के लिये बन्द का आयोजन किया गया था।
मायावती को तो देश या प्रदेश का जनता से कुछ लेना देना नहीं है उन्हें तो अपनी मूर्तियों को बनवाने से फुरसत नहीं है। उनकी कमजोर नस सी बी आई के हाथ में है और सी बी आई केन्द्र सरकार के हाथ में, सो मायावती को तो केन्द्र सरकार का साथ देना ही था, एक दिन पूर्व तक तो खाली मूली सस्पेन्स का दिखावा कर रहीं थीं।
समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह के पुत्र एक जगह इस गुण्डा प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे थे, उसका एक वक्तव्य सुन कर हँसी आ गयी। उन्होने कहा कि मायावती सी बी आई से डर गयी जिसके कारण उन्होनें प्रस्ताव के विरुद्ध केन्द्र सरकार के पक्ष मे वोट दिया। ये गुण्डे तत्व इतने बेफिक्र हो गये हैं कि इन्हें लगता है कि यह जो कुछ कह रहें हैं उसे ही आम जन सत्य मानते हैं। इधर वे सड़क पर केन्द्र सरकार के विरुद्ध आगजनी कर रहे थे उधर उसकी पार्टियाँ केन्द्र सरकार का साथ देने के लिये संसद से बहिर्गमन कर रही थी, शायद इस आशा में कि उनके विरुद्ध कोई कड़ी कार्यवाही न की जाय, भई हम भी तो आपकी तरह आम जन को बेवकूफ बना रहें हैं, आखिर हम हैं तो मौसेरे भाई ही।
अपने कुल जमा चार सांसदों को लेकर लालू ने संसद मे कहा कि अगर कटौती प्रस्ताव के पक्ष में ‘भाजपा’ न होती तो वे इसका समर्थन करते। क्या दलील दी है लालू ने। ऐसे ही नेताओं ने इस देश का बन्टाधार किया है।
खैर, भारत बन्द का गुण्डा प्रदर्शन भी हो गया, संसद मे सरकार भी बच गयी। बीच मे आम जन की जो दुर्दशा हुई उसकी शर्म न तो केन्द्र सरकार को होगी और न ही इस गुण्डा गर्दी करने वाले नेताओं को होगी। अगले दिन दोनो खबरें सुर्खियों में होंगी दोनो पक्ष अपने-अपने जवाँमर्दी की चर्चा करेंगे आम जन की तरफ पहले की भाँति उदासीन रहते हुए इसे आम जनता की जीत बताएंगे।
विभिन्न जातियों एवं समुदायों में बँटा आम जन पूर्व की भाँति सिर्फ अपनी दशा पर आँसू बहाता रहेगा। शायद आम जन के साथ यह ठीक ही होगा, अपने कर्मों का फल तो मिलना ही है।
शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009
भारत सरकार को डर नही लगता
अभी कुछ दिन पूर्व एक समाचार पत्र में पढ़ा कि रिजर्व बैंक ने देश में अंधाधुन्ध आ रही नकली मुद्रा को लेकर आगाह किया, इस पर हमारे वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने कहा कि यह उनकी नजर में कोई बड़ा खतरा नहीं है। चूंकि उसकी नजर ही सरकार की नजर है इसलिए सरकार भी इसको लेकर भयभीत नहीं है। उन्होने बाकायदा आंकड़े प्रस्तुत कर यह सिद्ध किया कि नकली करेंसी अभी कुल मुद्रा की 0.001 प्रतिशत ही है। जब तक एक के पहले लगने वाले शून्य एक के बाद में लगने न शुरु हो तब तक कोई खतरे की बात नहीं है। उन्होने यह भी कहा कि भारत छोटा मोटा देश नहीं है। हमें घबराने की जरूरत नही है। सरकार नकली मुद्रा लाने वालों पर स्टेनलेस स्टील से भी कड़ी नजर रख रही है। समस्या यह है कि स्टेनलेस स्टील पारदर्शी नही होता इसीलिये इस तरह की नजर रखने के बावजूद कुछ दिन पूर्व डुमरिया गंज जिला- सिद्धार्थ नगर, उत्तर प्रदेश के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के करेंसी चेस्ट में करोड़ों के नकली नोट बरामद हुए थे। वित्त मंत्री जी को व उनकी सरकार को ऐसी कई बातों से भय नही लगता न लगा, जिसका वर्णन उन्होने अभी नही किया है पर भविष्य मे कर सकते हैं वे निम्नवत हैं।
- देश में आतंक वादी खुलेआम आयें, घूमें, कहाँ बम फोड़ना है इसकी रूपरेखा बनाएं और उसे पूरा करें। इस काम में सरकार व उसकी एजेंसियों का पूरा सहयोग मिलेगा, क्योंकि इनके कार्यों से सरकार नही मरती मरते है केवल आम आदमी जिसकी यहाँ बहुतायत है, करोड़ों में से कुछ हजार कम भी होते हैं तो कोई चिन्ता की बात नही। सरकार को इससे भय नही लगता क्य़ोंकि घटना के बाद बड़ी-बड़ी बातें कर वोट लूटने की काफी गुँजाइस रहती है।
- काश्मीर से हिन्दुओं को खदेड़ा जाय, उनकी सम्पत्ति लूटी जाय, वे बेघर होकर दिल्ली व अन्य नगरों में नरकीय जीवन व्यतीत करें, इससे भी सरकार को भय नही लगता क्योंकि हिन्दू हैं ही इसी लायक। अगर इससे सरकार भयभीत हो जायेगी तो सरकार को खतरा हो जायेगा अतऐव वह इससे भयभीत नहीं, बल्कि प्रसन्न होती है कि हिन्दू इसी तरह पीटे-कुचले जाने से उसका वोट बैंक बढ़ता है।
- असम में उल्फा आतंकवादियों द्वारा सैकड़ो निरीहों को मारने से भी सरकार भयभीत नही होती, इससे उसे राजनीति करने के नये आयाम मिलते हैं।
- सरकार महराष्ट्र के मनसे व शिवसेना के गुंडो से भी भयभीत नही होती, वह तो इसे शह देती है क्योंकि इसमें हिन्दू ही आपस मे कटते-मरते है। अलगाव-वाद फैलता है जो सरकार के लिए खाद का काम करती है, भला इससे भयभीत क्यों हुआ जाय।
- सरकार बम्बई, दिल्ली, अहमदाबाद शहरों मे हुए आतंकवादी घटनाओं से भी भयभीत नही होती, क्योकि इसमें कहीं भी सरकार नही मरी। आतंकवादी तो सरकार का काम आसान ही कर रहें है, ऐसी घटनाओं से आबादी में कमी आती है और सरकार को बन्दर प्रयास करने का अवसर प्राप्त होता है।
- मधु कोड़ा जैसे लोगों द्वारा लूटपाट कर धन विदेशों में लगाने जैसी घटनाओं से भी सरकार चिन्तित नही होती, क्योकि देश मे धन की कोई कमी नहीं है, गजनी से लेकर अंग्रेज व अब देसी अंग्रेज लूट ही रहें है, इससे कोई फर्क तो पड़ा नही, क्योकि आतंकवादी नकली नोट तो ला ही रहे हैं।
- देश को टुकड़ों में बाँटने वालों से भी सरकार भयभीत नही होती, भारत बहुत बड़ा देश है यदि इसके बीस-पच्चीस टुकड़े हो भी जाते हैं तो क्या फर्क पड़ेगा, इससे तो सरकार के मंत्रियों की संख्या ही बढ़ेगी।
सरकार तो डरती है केवल निम्नलिखित बातों से इसीलिये वह अपनी पूरी ताकत इन्हें नष्ट करनें में लगाती है, और काम के लिये सरकार के पास न तो समय है न ही इच्छा शक्ति।
- राष्टीय स्वयं सेवक संघ से।
- हिन्दू एकता से।
- मुसलमानों से वन्देमातरम् कहने वालों से।
- देश हित की बात कहने वालों से।
- देश की एकता और अखन्डता की केवल बातें न कर ऐसा प्रयास करने वालों से।
- एक देश- एक कानून की माँग करने वालों से।
- राष्टीय स्वयं सेवक संघ से।