रविवार, 28 दिसंबर 2008

Khali-Bali




शनिवार, 13 दिसंबर 2008

टिकोला का सत्य

अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपने को देय।

काना देखा यह करे, और कोऊ न लेय ।।

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008

अंधेर नगरी (खुला पत्र, डायेक्टर के नाम)

महोदय,

अवगत कराना है कि आपको शायद ही यह ज्ञात कि पावर हाउस टरबाइन पर श्री सच्चिदा नन्द पान्डेय के काकस मण्डली का राज्य चलता है। वे कितने खतरनाक व चालाक है, इसका नजारा हाल में ही आपके द्वारा हटाए गये एक बेहतरीन टरबाइन मेकैनिक श्री नर्वदा प्रसाद के रूप में परिलक्षित हुआ है।

पान्डेय जी की काकस मण्डली में शामिल होने की केवल एक ही शर्त है कि उन्हें मासिक चन्दे के रूप में धन अथवा अपना क्रम आने पर शराब मुहैया कराया जाय। महोदय को उनके ऊपर इतना अन्धविश्वास है कि आप उनके विरुद्ध एक शब्द भी सुनना गवारा नही करते व उनके एक बार के ही कहने पर बिना सोचे समझे एक ही झटके में एक बेहतरीन मेकैनिक को निकाल बाहर किया।

महोदय ने एक बार भी सही तथ्यों को समझने का प्रयास नही किया, कि पाण्डेय जी काकस मण्डली के पॉच सात सदस्यों साथ होते हुए भी कैसे मार खा लिये? यह बात यहाँ मिल में किसी के गले नही उतरती। सच्चाई यह है कि उन लोगों ने ही नर्वदा प्रसाद को मारा व बेशर्मी से मार खाने की बात का दुष्प्रचार किया। इसके पूर्व भी कई प्रसंग आ तुके है कि किसी ने पाणडेय जी को गलती पर टोका तो उन्होने लज्जित होने के बजाय आपसे शिकायत कर दी। गत बन्दी सत्र में ऐसे अनेक उदाहरण सामने आ चुके हैं, यह अलग बात है कि आपको इसकी जानकारी न हो।

पाण्डेय जी ऐसे किसी भी ब्यक्ति को सहन नहीं कर सकते जिसका ज्ञान उनके समकक्ष अथवा अधिक हो इसके उदाहरण पूर्व में भी आ चुके हैं उनका विवरण देना आवश्यक नही है। आपको शायद ज्ञात होगा कि गत वर्ष पाणडेय जी ने मोतीहारी में नौकरी करते हुए कितनी सफाई से बीमारी का बहाना बनाया, यह तो संयोग था कि वहॉ उनकी दाल नहीं गली और वापस आ गये। वैसे उनके जैसे लोगों की दाल केवल यहीं गल सकती है क्योकि यहाँ समने वालों की आँखों पर पर्दा डालना बहुत आसान है। आपको शायद यह विश्वास न हो, परन्तु यह सत्य है कि इस वर्ष टरबाइनों के ओवर हालिंग के दौरान (टरबाइन के खुलने व बॉधने के समय) पाण्डेय जी बिना धूर्तता दिखाए उपस्थित रहे जब कि गत वर्ष इस दौरान वे इलाज कराने के बहाने मोतीहारी में नौकरी कर रहे थे, क्यों? यह केवल इसलिए कि इस बन्दी सीजन में श्री नर्वदा प्रसाद यहाँ थे, ऐसे समय में उनके न रहने पर काम में किसी प्रकार की रुकावट नहीं आती, ऐसा वे कैसे कर सकते थे? हॉ उसके बाद वे अनेकों बार यहॉ से बिना बताए अचानक गायब होते रहे।

नर्वदा प्रकरण में सही तथ्य इस प्रकार हैं

आप जानते ही हैं के 10 मेगा वाट टरबाइन, सेंसिटिव टरबाइन है उस पर बेहतर टरबाइन अटेन्डेन्ट
एंव आयल मैन की ड्यूटी रहनी चाहिए, ड्यूटी शीट में यही ब्यवस्था है. श्री नर्वदा प्रसाद के शिफ्ट आयल मैन को हटा कर दूसरे आयल मैन को भेज दिया गया, इसी बात का विरोध करने पर यह कुचक्र रचा गया. जब नर्वदा ने इस बात का पान्डेय जी से विरोध किया तो उसे बुरा भला व अपशब्द कहे गये, और झगड़ा शुरु किया। बार बार इरीटेट करने पर नर्वदा के मुख से भी अपशब्द निकले, फिर क्या था? पान्डेय जी की काकस मन्डली नर्वदा पर पिल पड़ी,अपने बचाव नें नर्वदा ने भी हाथ पैर चलाए होंगे तो इसमे अनुचित क्या? बेशर्मी की इन्तहा का बड़ा भद्दा स्वरूप इसके बाद शुरू हुआ जिसके अन्तर्गत उनकी पूरी मण्डली छाती पीटने लगी कि नर्वदा ने पान्डेय जी को पीट दिया। शातिर अपराधियों की भाँति इनकी मण्डली इसकी गवाह बन गयी। पान्डेय जी ने छाती पीट पीट कर सभी को छलते रहे, महोदय भी पूर्व की भाँति उनके छलावे में आ गये और बिना सत्यता जाने नर्वदा को निकाल बाहर किया। आपके द्वारा अनजाने में नर्वदा के साथ अन्याय करवा कर पान्डेय जी किसी शातिर अपराधी की भाँति अपनी कुटिल सफलता पर गौरवान्वित होते रहे।

इस घटना का मिल में मौजूद सभी निष्कपट कर्मचारियों को सदमा पहुँचा, कुटिलता से परि पूर्ण चालों को सफल होते देख सामान्य निष्कपट व संवेदनशील कर्मचारियों पर अत्यन्त घातक प्रभाव पड़ा और वे कुटिल ब्यक्तियों द्वारा मिल मिल को क्षति पहुँचाते हुए देखने को विवश हैं, क्योंकि इस काम के रोकने टोकने पर यह उन्ही के ऊपर भारी पड़ेगी।


 


 


  टिकौला मिल का शुभचिन्तक यदि महोदय मानते हों। 

बुधवार, 19 नवंबर 2008

मोटेराम जी शास्त्री

    पण्डित मोटेराम जी शास्त्री को कौन नही जानता! आप अधिकारियों का रूख देखकर काम
करते है। स्वदेशी आन्दोलन के दिनों मे अपने उस आन्दोलन का खूब विरोध किया था।
स्वराज्य आन्दोलन के दिनों मे भी अपने अधिकारियों से राजभक्ति की सनद हासिल की थी।
मगर जब इतनी उछल-कूद पर उनकी तकदीर की मीठी नींद न टूटी, और अध्यापन कार्य से पिण्ड
न छूटा, तो अन्त मे अपनी एक नई तदबीर सोची। घर जाकर धर्मपत्नी जी से बोलेइन बूढ़े
तोतों को रटाते-रटातें मेरी खोपड़ी पच्ची हुई जाती है। इतने दिनों विद्या-दान देने
का क्याफल मिला जो और आगे कुछ मिलने की आशा करूं।
धर्मपत्न ने चिन्तित होकर
कहाभोजनों का भी तो कोई सहारा चाहिए।
मोटेरामतुम्हें जब देखो, पेट ही की फ्रिक
पड़ी रहती है। कोई ऐसा विरला ही दिन जाता होगा कि निमन्त्रण न मिलते हो, और चाहे
कोई निन्दा करें, पर मै परोसा लिये बिना नहीं आता हूं। आज ही सब यजमान मरे जाते है? मगर जन्म भर पेट ही खिलाया तो क्या किया। संसार का कुछ सुख भी तो भोगना चाहिए। मैने
वैद्य बनने का निश्चय किया है।

स्त्री ने आश्चर्य से कहावैद्य बनोगे, कुछ
वैद्यकी पढ़ी भी है?
मोटेवैद्यक पढने से कुछ नही होता, संसार मे विद्या का इतना
महत्व नही जितना बुद्धि का, दो-चार सीधे-सादे लटके है, बस और कुछ नही। आज ही अपने
नाम के आगे भिष्गाचार्य बढ़ा लूंगा, कौन पूछने आता है, तुम भिष्गाचार्य हो या नही।
किसी को क्या गरज पड़ी है जो मेरी परिक्षा लेता फिरे। एक मोटा-सा साइनबोर्ड बनवा
लूंगा। उस पर शब्द लिखें होगेयहा स्त्री पुरूषों के गुप्त रोगों की चिकित्सा विशेष
रूप से की जाती है। दो-चार पैसे का हउ़-बहेड़ा-आवंला कुट छानकर रख लूंगा। बस, इस
काम के लिए इतना सामान पर्याप्त है। हां, समाचारपत्रों मे विज्ञापन दूंगा और नोटिस
बंटवाऊंगा। उसमें लंका, मद्रास, रंगून, कराची आदि दूरस्थ स्थानों के सज्जनों की
चिटिठयां दर्ज की जाएंगी। ये मेरे चिकित्सा-कौशल के साक्षी होगें जनता को क्या पड़ी
है कि वह इस बात का पता लगाती फिरे कि उन स्थानों मे इन नामों के मनुष्य रहते भी
है, या नहीं फिर देखों वैद्य की कैसी चलती है।

स्त्रीलेकिन बिना जाने-बूझ दवा
दोगे, तो फायदा क्या करेगी?
मोटेफायदा न करेगी, मेरी बला से। वैद्य का काम दवा
देना है, वह मृत्यु को परस्त करने का ठेका नही लेता, और फिर जितने आदमी बीमार पड़ते
है, सभी तो नही मर जाते। मेरा यह कहना है कि जिन्हें कोई औषधि नही दी जाती, वे
विकार शान्त हो जाने पर ही अच्छे हो जाते है। वैद्यों को बिना मांगे यश मिलता है।
पाँच रोगियों मे एक भी अच्छा हो गया, तो उसका यश मुझे अवश्य ही मिलेगा। शेष चार जो
मर गये, वे मेरी निन्दा करने थोडे ही आवेगें। मैने बहुत विचार करके देख लिया, इससे
अच्छा कोई काम नही है। लेख लिखना मुझे आता ही है, कवित्त बना ही लेता हूं, पत्रों
मे आयुर्वेद-महत्व पर दो-चार लेख लिख दूंगा, उनमें जहां-तहां दो-चार कवित्त भी जोड़
दूंगा और लिखूंगा भी जरा चटपटी भाषा मे । फिर देखों कितने उल्लू फसते है यह न समझो
कि मै इतने दिनो केवल बूढे तोते ही रटाता रहा हूं। मै नगर के सफल वैद्यो की चालों
का अवलोकन करता रहा हू और इतने दिनों के बाद मुझे उनकी सफलता के मूल-मंत्र का ज्ञान
हुआ है। ईश्वर ने चाहा तो एक दिन तुम सिर से पांव तक सोने से लदी होगी।
स्त्री
ने अपने मनोल्लास को दबाते हुए कहामै इस उम्र मे भला क्या गहने पहनूंगी, न अब वह
अभिलाषा ही है, पर यह तो बताओं कि तुम्हें दवाएं बनानी भी तो नही आती, कैसे बनाओगे, रस कैसे बनेगें, दवाओ को पहचानते भी तो नही हो।
मोटेप्रिये! तुम वास्तव मे बड़ी
मूर्ख हो। अरे वैद्यो के लिए इन बातों मे से एक भी आवश्यकता नही, वैद्य की चुटकी की
राख ही रस है, भस्म है, रसायन है, बस आवश्यकता है कुछ ठाट-बाट की। एक बड़ा-सा कमरा
चाहिए उसमें एक दरी हो, ताखों पर दस-पांच शीशीयां बोतल हो। इसके सिवा और कोई चीज
दरकार नही, और सब कुछ बुद्धि आप ही आप कर लेती है। मेरे साहित्य-मिश्रित लेखों का
बड़ा प्रभाव पड़ेगा, तुम देख लेना। अलंकारो का मुझे कितना ज्ञान है, यह तो तुम
जानती ही हो। आज इस भूमण्डल पर मुझे ऐसा कोई नही दिखता जो अलंकारो के विषय मे मुझसे
पेश पा सके। आखिर इतने दिनों घास तो नही खोदी है! दस-पाचं आदमी तो कवि-चर्चा के
नाते ही मेरे यहां आया जाया करेगें। बस, वही मेरे दल्लाह होगें। उन्ही की मार्फत
मेरे पास रोगी आवेगें। मै आयुर्वेद-ज्ञान के बल पर नही नायिका-ज्ञान के बल पर
धड़ल्ले से वैद्यक करूंगा, तुम देखती तो जाओ।
स्त्री ने अविश्वास के भाव से
कहामुझे तो डर लगता है कि कही यह विद्यार्थी भी तुम्हारे हाथ से न जाए। न इधर के
रहो ने उधर के। तुम्हारे भाग्य मे तो लड़के पढ़ाना लिखा है, और चारों ओर से ठोकर
खाकर फिर तुम्हें वी तोते रटाने पडेगें।
मोटेतुम्हें मेरी योग्यता पर विश्वास
क्यों नही आता?
स्त्रीइसलिए कि तुम वहां भी धुर्तता करोगे। मै तुम्हारी
धूर्तता से चिढ़ती हूं। तुम जो कुछ नही हो और नही हो सकते,वह क्यो बनना चाहते हो? तुम लीडर न बन सके, न बन सके, सिर पटककर रह गये। तुम्हारी धूर्तता ही फलीभूत होती
है और इसी से मुझे चिढ़ है। मै चाहती हूं कि तुम भले आदमी बनकर रहो। निष्कपट जीवन
व्यतीत करो। मगर तुम मेरी बात कब सुनते हो?
मोटेआखिर मेरा नायिका-ज्ञान कब काम
आवेगा?
स्त्रीकिसी रईस की मुसाहिबी क्यो नही कर लेते? जहां दो-चार सुन्दर
कवित्त सुना दोगें। वह खुश हो जाएगा और कुछ न कुछ दे ही मारेगा। वैद्यक का ढोंग
क्यों रचते हों!
मोटेमुझे ऐसे-ऐसे गुर मालूम है जो वैद्यो के बाप-दादों को भी न
मालूम होगे। और सभी वैद्य एक-एक, दो-दो रूपये पर मारे-मारे फिरते है, मै अपनी फीस
पांच रूपये रक्खूगा, उस पर सवारी का किराया अलग। लोग यही समझेगें कि यह कोई बडे
वैद्य है नही तो इतनी फीस क्यों होती?
स्त्री को अबकी कुछ विश्वास आया बोलीइतनी
देर मे तुमने एक बात मतलब की कही है। मगर यह समझ लो, यहां तुम्हारा रंग न जमेगा, किसी दूसरे शहर को चलना पड़ेगा।
मोटे—(हंसकर) क्या मै इतना भी नही जानता। लखनऊ
मे अडडा जमेगा अपना। साल-भर मे वह धाक बांध दू कि सारे वैद्य गर्द हो जाएं। मुझे और
भी कितने ही मन्त्र आते है। मै रोगी को दो-तीन बार देखे बिना उसकी चिकित्सा ही न
करूंगा। कहूंगा, मै जब तक रोगी की प्रकृति को भली भांति पहचान न लूं, उसकी दवा नही
कर सकता। बोलो, कैसी रहेगी?
स्त्री की बांछे खिल गई, बोलीअब मै तुम्हे मान गई, अवश्य चलेगी तुम्हारी वैद्यकी, अब मुझे कोई संदेह नही रहा। मगर गरीबों के साथ यह
मंत्र न चलाना नही तो धोखा खाओगे।
साल भर गुजर गया।

भिषगाचार्य
पण्डित मोटेराम जी शास्त्री की लखनऊ मे घूम मच गई। अलंकारों का ज्ञान तो उन्हे था
ही, कुछ गा-बजा भी लेते थे। उस पर गुप्त रोगो के विशेषज्ञ, रसिको के भाग्य जागें।
पण्डित जी उन्हें कवित्त सुनाते, हंसाते, और बलकारक औषधियां खिलाते, और वह रईसों मे, जिन्हें पुष्टिकारक औषधियों की विशेष चाह रहती है, उनकी तारीफों के पुल बांधते। साल
ही भर मे वैद्यजी का वह रंग जमा, कि बायद व शायदं गुप्त रोगों के चिकित्सक लखनऊ मे
एकमात्र वही थे। गुप्त रूप से चिकित्सा भी करते। विलासिनी विधवारानियों और शौकीन
अदूरदर्शी रईसों मे आपकी खूब पूजा होने लगी। किसी को अपने सामने समझते ही न
थे।
मगर स्त्री उन्हे बराबर समझाया करती कि रानियों के झमेलें मे न फसों, नही एक
दिन पछताओगे।
    मगर भावी तो होकर ही रहती है, कोई लाख समझाये-बुझाये। पंडितजी के
उपासको मे बिड़हल की रानी भी थी। राजा साहब का स्वर्गवास हो चुका था, रानी साहिबा न
जाने किस जीर्ण रोग से ग्रस्त थी। पण्डितजी उनके यहां दिन मे पांच-पाचं बार जाते।
रानी साहिबा उन्हें एक क्षण के लिए भी देर हो जाती तो बेचैन हो जाती, एक मोटर नित्य
उनके द्वार पर खड़ी रहती थी। अब पण्डित जी ने खूब केचुल बदली थी। तंजेब की अचकन
पहनते, बनारसी साफा बाधते और पम्प जूता डाटते थे। मित्रगण भी उनके साथ मोटर पर
बैठकर दनदनाया करते थे। कई मित्रों को रानी सहिबा के दरबार मे नौकर रखा दिया। रानी
साहिबा भला अपने मसीहा की बात कैसी टालती।
मगर चर्खे जफाकार और ही षययन्त्र रच
रहा था।

    एक दिन पण्डितजी रानी साहिबा की गोरी-गोरी कलाइयों पर एक हाथ रखे नब्ज देख
रहे थे, और दूसरे हाथ से उनके हृदय की गति की परिक्षा कर रहे थे कि इतने मे कई आदमी
सोटै लिए हुए कमरे मे घुस आये और पण्डितजी पर टूट पड़े। रानी भागकर दूसरे कमरे की
शरण ली और किवाड़ बन्द कर लिए। पण्डितजी पर बेभाव पड़ने लगे। यों तो पण्डितजी भी
दमखम के आदमी थे, एक गुप्ती संदैव साथ रखते थे। पर जब धोखे मे कई आदमियों ने धर
दबाया तो क्या करते? कभी इसका पैकर पकड़ते कभी उसका। हाय-हाय! का शब्द मुंह से निकल
रहा था पर उन बेरहमों को उन पर जरा भी दया न आती थी, एक आदमी ने एक लात जमाकर कहाइस
दुष्ट की नाक काट लो।
दूसरा बोलाइसके मुंह मे कलिख और चूना लगाकर छोड़
दो।
तीसराक्यों वैद्यजी महाराज, बोलो क्या मंजूर है? नाक कटवाओगे या मुंह मे
कालिख लगवाओगें?
पण्डितभूलकर भी नही सरकार। हाय मर गया!

दूसराआज ही लखनऊ
से रफरैट हो जाओं नही तो बुरा होगा।
पणिडतसरकार मै आज ही चला जाऊगां। जनेऊ की
शपथ खाकर कहता हूं। आप यहां मेरी सूरत न देखेगें।
तीसराअच्छा भाई, सब कोई इसे
पांच-पाचं लाते लगाकर छोड़ दो।
पण्डितअरे सरकार, मर जाऊगां, दया
करो
चौथातुम जैसे पाखंडियो का मर जाना ही अच्छा है। हां तो शुरू हो।

पंचलत्ती पड़ने लगी, धमाधम की आवाजें आने लगी। मालूम होता था नगाड़े पर चोट पड़
रही है। हर धमाके के बाद एक बार हाय की आवाज निकल आती थी, मानों उसकी प्रतिध्वनी
हो।
पंचलत्ती पूजा समाप्त हो जाने पर लोगों ने मोटेराम जी को घसीटकर बाहर निकाला
और मोटर पर बैठाकर घर भेज दिया, चलते-चलते चेतावनी दे दी, कि प्रात:काल से पहले भाग
खड़े होना, नही तो और ही इलाज किया जाएगा।
    मोटेराम जी लंगड़ाते, कराहते, लकड़ी टेकते घर मे गए और धम से गिर पड़े चारपाई पर गिर पडे। स्त्री ने
घबराकर पूछाकैसा जी है? अरे तुम्हारा क्या हाल है? हाय-हाय यह तुम्हारा चेहरा कैसा
हो गया!
मोटेहाय भगवान, मर गया।
स्त्रीकहां दर्द है? इसी मारे कहती थी, बहुत रबड़ी न खाओं। लवणभास्कर ले आऊं?
मोटेहाय, दुष्टों ने मार डाला। उसी
चाण्डालिनी के कारण मेरी दुर्गति हुई । मारते-मारते सबों ने भुरकुस निकाल
दिया।
स्त्रीतो यह कहो कि पिटकर आये हो। हां, पिटे हो। अच्छा हुआ। हो तुम लातो
ही के देवता। कहती थी कि रानी के यहां मत आया-जाया करो। मगर तुम कब सुनते
थे।
मोटेहाय, हाय! रांड, तुझे भी इसी दम कोसने की सूझी। मेरा तो बुरा हाल है और
तू कोस रही है। किसी से कह दे, ठेला-वेला लावे, रातो-रात लखनऊ से भाग जाना है। नही
तो सबेरे प्राण न बचेगें।
स्त्रीनही, अभी तुम्हारा पेट नही भरा। अभी कुछ दिन और
यहां की हवा खाओ! कैसे मजे से लड़के पढ़ाते थे, हां नही तो वैद्य बनने की सूझी। बहुत
अच्छा हुआ, अब उम्र भर न भूलोगे। रानी कहां थी कि तुम पिटते रहे और उसने तुम्मारी
रक्षा न की।

पण्डितहाय, हाय वह चुडैल तो भाग गई। उसी के कारण । क्या जानता था
कि यह हाल होगा, नहीं ता उसकी चिकित्सा ही क्यों करता?
स्त्रीहो तुम तकदीर के
खोटे। कैसी वैद्यकी चल गई थी। मगर तुम्हारी करतूतों ने सत्यनाश मार दिया। आखिर फिर
वही पढौनी करना पड़ी। हो तकदीर के खोटे।
प्रात:काल मोटेराम जी के द्वार पर ठेला
खड़ा था और उस पर असबाब लद रहा था। मित्रो मे एक भी नजर न आता था। पण्डित जी पड़े
कराह रहे थे ओर स्त्री सामान लदवा रही थी।

सोमवार, 17 नवंबर 2008

नेताओं की वोट परस्ती

इन दिनों देश की राजनीतिक स्थिति को देख कर सभी देश भक्त नागरिकों का हृदय छलनी हो जाता है। वर्तमान समय में देश की राजनीति का नैतिक स्तर निम्नतम् बिन्दु पर पहुँच गया है। राज नेता, नेता न होकर वोट के सौदागर बन गए हैं। वर्तमान भारत सरकार बिना रीढ़ की है, सत्तारूढ़ दल अगला चुनाव जीतने के लिए किसी भी स्तर तक गिरने को तैयार है। कांग्रेस सहित अनेक दल मुसलिम वोटों थोक के व्यापारी बनने हेतु जमीन आसमान एक कर रहें हैं। उनकी निगाहों में बड़ी डीलरशिप पाने के लिए समाज का तोड़ना, देश का अहित करना,आवश्यक है भले ही देश टूटता है तो टूटे। मुसलिम तुष्टिकरण करने की होड़ मची है, इसका पैमाना भी बड़ा सीधा है, बहुसंख्यक हिन्दुओं गाली देना। जो जितना ही ज्यादा गाली देगा उसे उतना ही बड़ा मुसलिम वोटों का आर्डर मिलेगा।
एक हैं अमर सिंह, समाजवादी पार्टी के नेता है, वे मारे गये आतंकवादियों के घर मातमपुर्सी के लिए जाना अपना धर्म समझते हैं। आज सारा विश्व मुसलिम आतंकवाद से पीड़ित है, पर उन्हे वे सच्चा समाजवादी, सच्चा देशप्रेमी, बताने में नहीं हिचकते। उनकी निगाहों में ऐसा करने से मुसलिम वोटों को वे अपनी ओर ऐसा खींच लेंगे जैसै चुम्बक लोहे को खींचता है। उन्हे हिन्दुओं की चिंता नहीं है क्योंकि हिन्दू आपस में बंटे हुए हैं। इसी प्रकार एक है कुलदीप नैयर, अखबारों में स्तम्भ लिखते हैं, उन्हें सावन के अन्धों की तरह सब बाबरी ही दिखाई देती है। हिन्दुओं को गाली देना अपना परम कर्तव्य समझते हैं, मजे की बात यह है कि, यदि कैलीफोर्निया में आये तूफान के विषय में लेख लिख रहें हों तो भी उसमें तथाकथित बाबरी मसजिद का जिक्र करना नहीं भूलते। एक हैं राम बिलास पासवान, उन्हें तो सारे बांगला देशी घुसपैठिए अपने भाई लगते हैं उनके लिए राशन कार्ड बनवाना अपना धर्म समझते हैं भले ही इस कारण उनके समाज के लोगो की दुशवारियां बढ़े क्योंकि इसी को वे मुसलिम वोटों के लिए जरूरी मानते हैं।
यह देख कर अत्यन्त दुःख होता है कि दो हजार साल से गुलाम रहे हिन्दुओं की आत्मा जैसे मर गई हो। गुलामी तो ऐसी उनके खून में रच बस गयी है कि वे देखते हुए भी अन्धों का अनुसरण करने में उन्हे गर्व महसूस होता है। हिन्दू अपनी ही जाति के दुश्मन हैं, इन्हे बाहरी दुश्मनों की आवश्यकता ही नही है, इस दुश्मनी को बढ़ाने के लिए हिन्दू समाज में मायावती, लालू, मुलायम करुणाकरन,पाटिल आदि जैसे अनेक नेता मौजूद हैं। सैकड़ो सालो की मुसलिम आक्रान्ताओं की गुलामी के बाद हिन्दुओं को अंग्रेजों की गुलामी उपहार में मिली। आपस में लड़ते रहने की इनकी पुरानी नीति के कारण अंग्रेजों ने इस कौम को कुत्ता कहना शुरु किया।
मुसलिम आक्रान्ताओं एवं अंग्रेजो ने हिन्दुओं की इस खूबी का खूब लाभ उठाया, अब ये नेता उठा रहे हैं। हिन्दू अपनी जाति, उपजाति, अगड़े, पिछड़े, दलित, सिख, जैन में बुरी तरह विभाजित हैं। इस विभाजन को रोकना होगा अन्यथा ये नेता देश को खा जाएंगे। इन नेताओं को न देश की परवाह है और न ही समाज की, इन्हे केवल अपने वोट की चिन्ता है, इनकी ओर से समाज या देश जाय भाड़ में बस इनका वोट बैंक एवं नोट बैंक बना रहे, इसी की तिकड़म में रात दिन लगे रहते हैं।
ले दे कर एक भाजपा ही है जिससे देश को कुछ आशा है, परन्तु दुःख होता है कि इसके नेता भी आपस में लड़ने लगे हैं, इन्हे सर्व समाज से जुड़ना चाहिए क्योकि सच्चा देशभक्त इन्हे ही आशा भरी दृष्टि से निहार रहा है। हिन्दू आपस में जब तक लड़ते रहेंगे तब तक इस देश का भला नहीं को सकता, नेता जन तो .यही चाहते है कि हिन्दू समाज आपस में विभाजित एवं लड़ता ही रहे क्योंकि इनकी निगाहों में हिन्दू जितना टूटेंगे उतना ही देश टूटेगा और इनको उतना ही धन कमाने का मौका मिलेगा।
मेरी तो यही विनती है कि हिन्दुओं उठो, जुड़ो और ऐसे नेताओं से देश को मुक्त करने का आह्वान करो। धन्यवाद

रविवार, 16 नवंबर 2008

कश्मीर में अब मंदिरों पर कब्जे का दौर

कोई कहे कि कश्मीर में मंदिर तोड़े जा रहे हैं, तो आप कहेंगे इसमें नया क्या है। नई बात यह है कि अब नष्ट मंदिरों की संपत्ति पर बड़े पैमाने पर कब्जे हो रहे हैं। यह बात उप मुख्यमंत्री भी स्वीकार करते हैं और मौलवी एजाज जैसे कानूनदां भी, जो कब्जा करने वालों को घाटी का 'टेंपल लैंड माफिया' कहते हैं।
कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के संजय टिक्कू कहते हैं कि आतंकी हिंसा शुरू होने से अब तक 565 प्रमुख मंदिर जलाए जा चुके हैं। गली-मोहल्लों के मंदिर गिने जाएं, तो तादाद दो हजार से अधिक है। एडवोकेट मौलवी एजाज का आरोप है, 'मंदिरों की संपत्ति बेची जा रही है। घाटी में टेपल लैंड माफिया सक्रिय है। हिंदू-मुसलिम व नौकरशाही सब इसमें शामिल हैं। लैंड एबालिशमेंट एक्ट मंदिरों की संपत्ति पर लागू नहीं होता, लेकिन यहां उसकी आड़ में अपने चहेतों को मंदिरों की जमीन बांटी जा रही है। बाबा धर्मदास मंदिर की 14,000 कनाल जमीन थी, जो इसी एक्ट की आड़ में बेच दी गई।' शायद इसीलिए विभिन्न धार्मिक संगठनों ने मंदिरों की संपत्ति बेचने की सीबीआई जांच की मांग की है।
बसंतबाग मंदिर के पास अपना आटो रिक्शा साफ कर रहे अख्तर का कहना है कि पहले यहां भट्ट पूजा करते थे, पर उसने इस सवाल पर चुप्पी साध ली कि मंदिर किसने जलाया, कौन पत्थर उखाड़ रहा है। प्राचीन मंदिरों के विशाल परिसर और उनकी संपत्ति पर कब्जे से चिंतित उप मुख्यमंत्री मुजफ्फर हुसैन बेग कहते हैं कि राज्य सरकार मंदिरों की सुरक्षा के लिए विधेयक लाने जा रही है। एक अथारिटी बनेगी, जो प्रशासन के साथ मिलकर मंदिरों की देखभाल करेगी। मंदिरों की संपत्ति पर कब्जा करने वालों के खिलाफ हम कार्रवाई करने जा रहे हैं।
पनुन कश्मीर के डा. अजय चुरंगु मंदिर बिल से उत्साहित नहीं हैं। उनके संगठन ने 55 मंदिर कमेटियों की सहमति से एक मसौदा सरकार को सौंपा था। वह कहते हैं, 'हम देखना चाहते हैं, सरकार हमारे कितने सुझाव बिल में शामिल करती है। हम चाहते है कि समिति में कोई गैर हिंदू न हो।'
नष्ट मंदिरों की मूर्तियों का कहीं ब्योरा नहीं है। धर्मार्थ ट्रस्ट के एक अधिकारी ने कहा कि मंदिरों के बड़े-बड़े पत्थर खास घरों की दीवारों में लगे हैं। एपीएमसीसी के विनोद पंडित के अनुसार कितनी प्राचीन मूर्तियां बिक चुकी हैं, इसकी गिनती नहीं। मंदिरों और शैववाद के विशेषज्ञ प्रो. एमएल कौल कहते हैं कि जैनाकदल में खानकाह, मां काली के मंदिर पर ही बनी है। इसे सैय्यद मीर हमदानी नामक मुसलिम संत के कहने पर सिकंदर बुतशिकन ने तोड़ कर खानकाह बनवा दी।
उधर, कई संगठन मंदिरों के किवाड़ फिर से खोल रहे है। विनोद पंडित कहते हैं कि हमने दस मंदिरों के किवाड़ खोले, लेकिन बाद में स्थिति आतंकवाद के चरम दौर वाली हो गई। हमने किवाड़ खोले तो सबने सराहा, प्रशासन ने वाहवाही लूटी; लेकिन बाद में हमारे लोगों की सुरक्षा वापस ले ली गई।
क्या कहते हैं कश्मीरी नेता:
-मंदिरों की मूर्तियां तस्करों ने चोरी की होंगी
[शब्बीर अहमद शाह, अध्यक्ष, जम्मू कश्मीर डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी]
-मंदिरों को जलाना या गिराना कश्मीरी मुसलमान का काम नहीं। कश्मीरी पंडित लौटे, लेकिन उन्हें हमारी तहरीक के मुखालिफ काम नहीं करना होगा। हम शुरू से कह रहे है कि यहां कुछ बाहरी तत्व मंदिर बेच रहे है।
[सैय्यद अली शाह गिलानी, हुर्रियत के कट्टरपंथी धड़े के नेता]

शनिवार, 15 नवंबर 2008

रोग नाश के लिए


 


 

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टातुकामान् सकलानभीष्टान।

त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्राश्रयंताप्रयान्ति।।